Friday, May 3, 2019

गंतव्य

ये जो चल रहा है तेरे भीतर,,,
यही चल रहा है मेरे भीतर,,
काश अगर वो पल नही आता
तो शायद जीवन कुछ और होता,,
तूने हर वादा निभाया
तूने प्यार का मतलब समझाया
तूने दिल को बहलाया
तूने दिल को समझाया
में इतना भी ना कर पाया
क्यों में तुझे अपना बना ना पाया,,??
क्यों में तेरा हाथ थाम ना पाया,,,??
जो सपने देखे थे साथ बैठ कर
क्यों उनको पूरा कर नही पाया,,,??
क्या में डर गया हूं दुनिया से,,,,
इनके रीति रिवाजों से,,,,
में कायर हु में बुज़दिल हु,,,,,,
जो सोचा था वो कर ना सका,,,,
तेरे बिना भी में मर ना सका,,,,
कल जो पास था मेरा
आज क्यू इतना दूर है
कैसे समझाऊ अब इस दिल को
की  तू अब पास नही है ,,
तुझे खोकर अब कोई चाहत नही इस दिल की
बस एक तुही चाहत थी
ओर तू ही चाहत है,,,।

दिनकर

अंतर्मन की व्यथा बतलाने दिनकर कोई आया है
जलते तपते तन को लेकर दिनकर कोई आया है
स्वर्ण किरणों को लेकर संग दिनकर कोई आया है
रोशन करने जग को देखो दिनकर कोई आया है
अंतर्मन की व्यथा बतलाने दिनकर कोई आया है,,,,,

जलते हुए तन को लेकर देखो में आया हु
तपते हुए मन को लेकर देखो में आया हु
करने रोशन जग को सारे देखो में आया हु
भोर सवेरे बिना स्वार्थ के देखो में आया हु

डर

सोचता हू कभी तो लगता है जिंदगी आसान है
पर जब कोई सपना
पलको पर आकर कुछ कहने लगता है
तब अहसास होता है कि नही
ज़िन्दगी आसान नही है
यह तो उस पीड़ा के समान है जो
हर वक्त धीरे धीरे उम्र को काट कर
जीवन को सागर की गहराई में
ले जाती है जहाँ
सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है
ओर नज़र धुंधली होने लगती है
हाथ कांपने लगते है,,
वह सपना जिसमे तुझको
पाने की चाहत रखी थी
वो कांच के समान टूटने
लगता है,,,

अंतर्मन की व्यथा

एक सपना था जिसमे
तुझको पाने की चाहत थी
तेरी खामोशी समझ रहा हु में
तेरी उदासी समझ रहा हु में
पर इस दुनिया की रीत
से डरता हूँ,,
सोचता हूं की अब
गिर ही जाता हूं

Saturday, August 18, 2018

नही अब में थक गया हूं
ये काम का बोझ अब
मुझसे  ढोहा नही जाता,,,,
अब थोड़ा आराम करने दो
ये थकावट अब
मेरा कहना नही मानती
थोड़ा  आराम कर लेता हूं
अरे कहा,,,
कल तो घर की किश्त भरनी है
स्कूल की फीस बाकी है
ओर ये खाली पड़े डब्बे
नही नही,,,
रुको में जाता हूं काम पर
शाम को आ जाऊंगा
इंतजार मत करना ,,,,,

अटल से अनंत तक


नयन पटल से एक तारा टूटा
सूरज से सन्मुख एक साथी छूटा
नाम अटल है
स्वर अटल है
सत्य अटल है
वीर अटल है
गंगा की हर धार अटल है
सूरज का हर ताप अटल है
सागर के उस पार अटल है
कर्म अटल है
अमर अटल है अमर अटल है

Tuesday, June 28, 2016

Admin


उम्मीदों का शहर

शहर जो सपने साकार करे, शहर जो इस बेपरवाह भीड़ में भी उम्मीद जगाये,
कुछ ऐसे ही सपने लेकर आये हम इस खूबसूरत शहर *उदयपुर* में,,,,

उदयपुर उम्मीदों का शहर, हर कोई उदयपुर घूमना चाहता है यहाँ की खूबसूरती को अपने ख्यालो में उतारना चाहता है
जितना खूबसूरत यह  शहर है   उतने ही खूबसूरत यहाँ के लोग,,,

4 साल पहले राजस्थान के नंबर 1 कॉलेज, बीएन कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी  में  एडमिशन  लेते वक्त ये सोच रहे थे की कितने अकेले है हम इस शहर में,

अनजान लोग, अनजान शहर और एक नया वातावरण जहा हमे अगले चार सालो तक यही पर रहना हे पर कोई भी यह नही जानता था की इन चार सालो में इस शहर से इतना  गहरा नाता जुड़ जायेगा।

कॉलेज का  पहला दिन जब जब क्लास में एक दो को छोड़ कर सब एक दूसरे से अनजान थे पर कोई भी यह नही जनता था की आने वाले समय में इन सबसे दोस्ती इतनी गहरी हो जायेगी ।

इस खूबसूरत शहर ने ही हम दोस्तों को मिलाया है  ,पता नही में इस शहर का शुक्रिया कैसे करू,।

1st इयर ख़तम होते होते हमने आधा उदयपुर भी घूम चुके थे और क्लास के आधे लड़के भी दोस्त बन चुके थे
जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे वैसे दोस्ती गेहरी होती गयी  इस  शहर से,,,,

कॉलेज के दोस्तों के साथ घूमना अब आम बात हो गयी थी।

कॉलेज में खूब मझे किये खूब मस्ती की  बोहत बार दोस्तों से लड़ाई भी होती थी पर  वो ज्यादा दिन तक नही चलती थी,,,,

2nd इयर खत्म हुआ हमे पता भी नही चला,,,,

3rd इयर भी ख़तम हो गया और लड़के अभी तक मदन के दूध के हलवे का ही इन्तेजार कर रहे थे ।

4th इयर के एग्जाम हो गए है अब बस कुछ ही दिन बाकी हे इस शहर में फिर सब अपने अपने घर,।

ये चार सालो का सफर कब खतम हो गया कुछ पता ही नही चला,,, बोहत उतार चढ़ाव हुए  इन चार सालो में,,,,
कुछ दिनों बाद सब अपने अपने घर पे होंगे कुछ काम करेंगे और कुछ आगे पढाई करेंगे पर ये 2012 का बैच कोई नही भूल पायेगा,,,,

हमे नही पता था की इन चार सालो में इन अनजान से लगने वाले लड़को से दोस्ती इतनी गेहरी हो जायेगा,,,,

आज जब समय आ गया है एक दूसरे को छोड़ कर जाने का तो सबको लग रहा है की कही ना कही जरूर मिलेंगे पर इस मोबाइल के  जमाने में घर वालो से मिलने का समय नही है तो इनसे कहा मिलना हो पायेगा,,,?
क्या हम कही मिल पाएंगे ?
क्या हमारी फ़ोन पे बात होगी ?

बस यही सवाल जेहन में बार बार आ रहा है ।

समय आ गया हे अब इन सब दोस्तों को और इस शहर को अलविदा कहने का,,,

कुछ बाते जो कभी भूल नही पाएंगे जो हमेशा जेहन में रहेगी,,,,

कही पवन (पापा) की मस्तिया है तो कही
कही ललित ( डायनोसोर ) की शरारते

तनुज छाबड़िया 1st इयर से ही बाते बना रहा है  और आज भी बड़ी बड़ी बाते फेकता है
चार साल पहले भी उसकी सेलेरी 50000 हजार थी और आज  चार साल बाद भी 50000 हजार ही हे

जितेश और हितेश  चारो साल टोपर रहे है पर दुःख की बात हे की वो GPAT  क्रैक नही कर पाये,।

जिहादी युसूफ आज भी उतना ही हसाता है जितना चार साल पहले हँसता था,,,।

चिराग सा और पुष्पा का प्यार पूरी क्लास को पता है,,  गोटिया आज भी दर्द करती है चिराग सा की ।

धीरसा की हाइट चार साल में एक इंच भी नही बड़ी पर सपने बोहत बड़े बड़े है धीरसा के,,,।



बस अब ये सफ़र यही खत्म हो जायेगा और सब फिर से एक नए शहर में नई उम्मीद के साथ ,,,,

मौसम

ये शमा जो ढल रहा है
लेकर अपने साथ उझाले को
कर के अँधेरा जो जा रहा है
छोड़ कर यादो के सहारे
 कर के बारिश के हवाले
बुँदे देखो बदल रही है
मौसम को अपने लहजे में लेकर
बादल जो बरसने को है बेताब
करने मन को शांत हर एक दिल को
जो बहा रहा है पानी  सड़को पे
मानो होकर जुदा समन्दर से

ग़ुम हो जाता हु में

यु देखा ना कर बार बार
ग़ुम हो जाता हु में ।
तेरी याद में
अपनी शख्सियत भूल जाता हु में ।
लेकर में अपने दर्द को
अनजान शेहरो में
रास्ते भूल जाता हु में ।
जब लौट कर आता हु
तन्हा होकर जिस रस्ते में
अपने पेरो के निशान भूल जाता हु में।
जब आता हे खयाल दिल में
तेरे नाम का अपना नाम भूल जाता हु में ।